जजों की नियुक्ति मामले में मोदी सरकार को सुप्रीम कोर्ट की खरी-खरी!

हाई कोर्ट में जजों की नियुक्ति पर सरकार का ढीला रवैया एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट की नाराज़गी की वजह बना है. सुप्रीम कोर्ट ने आज अपनी तरफ से भेजे गए नामों के मंज़ूर न होने पर सरकार से सफाई मांगी. कोर्ट ने कहा है कि सरकार न्यायपालिका के साथ टकराव की स्थिति पैदा कर रही है.

पिछले 9 महीने में सुप्रीम कोर्ट की तरफ से भेजे गए 77 नामों में सिर्फ 18 को मंजूरी मिली गई. इस पर नाराज़गी जताते हुए आज चीफ जस्टिस टी एस ठाकुर ने कहा – “9 महीने से कॉलेजियम की तरफ से भेजे गए नामों पर सरकार बैठी है. सिर्फ कुछ नामों को मंजूरी दी गई है. अगर किसी वजह से दिक्कत है तो सिफारिशों को दोबारा विचार के लिए कॉलेजियम के पास भेजना चाहिए था.”

चीफ जस्टिस ने जजों की कमी से हो रही दिक्कतों का भी हवाला दिया. उन्होंने कहा, “देश के हाई कोर्ट जजों की लगभग 60 फीसदी संख्या पर काम कर रहे हैं. कोर्ट रूम लॉक रखने पड़ रहे हैं. क्या आप न्यायपालिका को बंद कर देना चाहते हैं?”

सरकार की तरफ से पेश एटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी की दलील थी कि सरकार लगातार नामों की समीक्षा कर उन्हें मंजूरी दे रही है. NJAC मामले पर सुनवाई के दौरान जजों की नियुक्ति रोक दिए जाने के चलते खाली पड़े पद बहुत ज़्यादा हैं. जजों की नियुक्ति से जुड़े नए मेमोरेंडम ऑफ़ प्रोसिजर (MOP) को भी सुप्रीम कोर्ट ने मंजूरी नहीं दी है. ये भी नियुक्ति की धीमी रफ्तार की वजह है.

हालांकि, चीफ जस्टिस ने इन दलीलों को मानने से मना कर दिया. उन्होंने कहा कि सरकारी अफसर फाइलों पर बैठे हैं. ऐसा ही रहा तो पीएमओ के सचिव और कानून मंत्रालय के अधिकारियों को कोर्ट में बुला कर जवाब लिया जाएगा. एटॉर्नी जनरल ने कोर्ट को भरोसा दिलाया कि जल्द ही और नामों को मंजूरी दी जाएगी. मामले की अगली सुनवाई 11 नवंबर को होगी.