लॉस एंजेल्स (NNI Live) :- मॉरीशस द्वीप के दक्षिण पूर्वी क्षोर पर एक जापानी तेल वाहक जहाज़ एम वी वकाशीयो से भले ही मात्र एक हज़ार टन तेल का रिसाव हुआ है, उससे तबाही का अनुमान लुइजियाना अथवा अलास्का में तेल रिसाव से पर्यावरण को कहीं अधिक क्षति हुई है। अमेरिकी पर्यावरणविदों की मानें तो इस रिसाव ने मॉरीशस, ख़ास कर लगून पर्यटन स्थल को पूरी तरह बर्बाद कर दिया है। मूलत: इस रिसाव से पर्यावरण संरक्षित समुद्री इको सिस्टम और ब्ल्यू मैरीन पार्क रिसर्व पूरी तरह चपेट में आ गए हैं। इसे विश्व में अपने ढंग के एक मात्र वेटलैंड के पनपने का संकट खड़ा हो गया। सच यह है कि यहाँ तेल रिसाव की कम ज़्यादा मात्रा नहीं, पर्यावरण की दृष्टि से जगह का महत्व ज़्यादा है।

भारतीय पर्यटकों को निराशा

भारत और मॉरीशस के प्राचीन संबंधो के मद्देनज़र हर साल लाखों भारतीय इस क्षेत्र के रमणीय सौंदर्य को निहारने मॉरीशस जाते हैं। इस कोविड महामारी के बाद मुमकिन है, इस बार भारतीय पर्यटकों को लगून के समुद्र तटीय गाँव महेबूरगे के समुद्र के जल का मोहक फ़िरोजी रंग नहीं, काले मटमैले झाग वाला पानी देखने को मिलेगा। ऐसे में क्या कोई पर्यटक समुद्र तटीय आरामदेह होटल की खिड़की से वह मनमोहक नज़ारा देख पाएँगे, संदेह है। बॉलीवुड फ़िल्म उद्योग को तो भारी निराशा हुई है, जहाँ आए दिन कोई न कोई फ़िल्मीटीम मॉरीशस के लगून द्वीप पर मनमोहक दृश्य कैमरे में बंद करने के लिए तत्पर रहती थी। इस क्षेत्र में, ख़ास कर लग़ून के समुद्री तट पर धवल चट्टानों में कोरल रीफ़, समुद्री जल पर तैर रही हरी हरी दिखने वाली घास का जो नज़ारा है, वह दोबारा कब देखने को मिलेगा, नहीं कहा जा सकता। इस कोरल रीफ़ की चट्टानों के बीच जल में इको संतुलन का ख़तरा पैदा हो गया है। कहा जा रहा है कि मॉरीशस को इस समस्या से निदान पाने में वर्षों लग जाएँगे। यों इस संकट से निपटने के लिए जापानी विशेषज्ञों का एक छह सदसीय दल मॉरीशस पहुँच चुका है। इस कार्य में  मदद के लिए फ़्रांस के निकटतम ‘आईलैंड आफ रियूनियन’ पर तैनात मिलिट्री एयरक्राफ़्ट पहले से मॉरीशस पहुँच चुका था। अब फ़्रांस और जापनी टीम मिलकर पर्यावरण संकट से निपटने में लगे हैं।

जाँच का विषय

मॉरीशस के प्रधानमंत्री प्रविंद जगन्नाथ ने इस भयावह स्थिति को देखते हुए ‘पर्यावरण आपात स्थिति’ लगा दी है। उन्होंने कहा है कि तेलवाहक जापानी जहाज़ लगून के समीप आया क्यों था, इसकी जाँच की जा रही है। जापानी जहाज़ कंपनी की सीईओ ने क्षमा याचना की है। उधर  मॉरीशस के हज़ारों छात्र, पर्यावरण प्रेमी और कामगार  लगून में समुद्र के उथले मटमैले जल की सफ़ाई में जुटे हुए हैं। अमेरिका में पर्यावरण विद और इंजीनियर अनिल कुमार ने कहा कि   सन 2010 में अमेरिका के दक्षिण में लूजियाना में जब बी पी आयल का गहरे समुद्र में तेल कूप में रिसाव से चारों ओर समुद्र के तल पर खारे पानी पर मटमैले तेल के गुब्बारे बन गए थे,  उस समुद्र तल के जल को साफ़ करना एक चुनौतीपूर्ण काम था। उसमें एक साल लग गया था। उस समय बीपी आयल कम्पनी को समुद्र तल के पानी की सफ़ाई आदि के अलावा बीस अरब डालर का जुर्माना भुगतना पड़ा था। प्रधानमंत्री ने कहा है कि जहाज़ में चार हज़ार टन तेल था, उसमें से सिर्फ़ एक हज़ार टन तेल का रिसाव हुआ है। इसमें शेष तेल को हेलीकाप्टर और संबंधित जापानी फ़र्म नगशिकी शिपिंग के प्रयासों से अन्य जहाज़ों के ज़रिए फैलने से बचा लिया गया है।

समुद्री जीव जंतुओं की तबाही

स्टेटलाइट से ली गई तस्वीरों की बात करें तो मुख्यतया तेल रिसाव मॉरीशस मेनलैंड में पवाइंट दी एसने और लली- ऐगरेट्टेस में हुआ है। इस तेल का रिसाव जिस तेज़ी से लग़ून की कोरल रीफ़ की ओर बढ़ा है, उसने खारे पानी में मिल कर पर्यावरण संतुलन को नष्ट कर दिया है, यह अत्यंत घातक है। समुद्र में 25 प्रतिशत मछलियाँ कोरल रीफ़ में जल के इकोसिस्टम पर जीवित रहती हैं। मॉरीशस समुद्र तटीय क्षेत्र में 1700 समुद्रीय जीवजंतु हैं, जिनमें आठ सौ तहाह की मछलियाँ हैं। तरह-तरह के समुद्रीय बड़े जीव हैं और दो तरह के कछुओं की प्रजातियाँ हैं। यही नहीं, इस क्षेत्र में, ख़ास कर लग़ून के समुद्री तट पर कोरल रीफ़, समुद्री जल पर हरी हरी दिखने वाली घास का जो नज़ारा है, वह दोबारा कब देखने को मिलेगा, नहीं कहा जा सकता। यों भी  ग्लोबल वार्मिंग बढ़ रही है। इस कोरल रीफ़ की धवल चट्टानों के बीच जल में इको संतुलन को ख़तरा पैदा हो गया है। संभव है, अब पर्यटक मछलियों और कछुओं को कूदते फाँदते देखने के नज़ारे के लिए तरस जाएँ। मॉरीशस के लोग इन कोलर रीफ़ से कितनी मछलियों और कछुओं को अपनी अपनी बालटियों और टबों में भर कर उन्हें जीवन दे पाएँगे कहना कठिन है। इन कोलर रीफ़ में तेल घुस गया है। उसने खारे पानी में मिल कर कार्बन बना दी है, उस से निजात पाने में वर्षों निकल जाएँगे। इसकी भरपाई जापानी तेल कम्पनी को करनी होगी।

उल्लेखनीय है कि 1978 में फ़्रांस में ब्रिटनी समुद्र तट पर मात्र सात करोड़ गैलन तेल का रिसाव हुआ था, जिससे 200 मील क्षेत्रफल में खारे पानी और तेल के मिलने से पानी मटमैला, बदबूदार और कार्बन युक्त होने से बीस हज़ार पक्षी मारे गए थे, हज़ारों जीव जंतु मारे गए थे।