मेरठ :- देश से लोकतंत्र को समाप्त कर तानाशाही स्थापित करने के लिए आज से 45 वर्ष पूर्व तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश पर आपातकाल थोप दिया था। आपातकाल का विरोध करने वाले नेताओं और कार्यकर्ताओं को जेलों में ठूंस दिया गया। आपातकाल का विरोध करने वालों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता सबसे आगे रहे।

मेरठ के पल्हेड़ा गांव के लोकतंत्र सेनानी जनमेजय चौहान संघ के प्रचारक रामलाल (अब अखिल भारतीय सह संपर्क प्रमुख) के साथ जेल गए थे।

आपातकाल की घोषणा करने के बाद देश के सभी प्रमुख विपक्षी नेताओं को जेल में डाल दिया। आपातकाल का विरोध धीरे-धीरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी फैलता चला गया। मेरठ में भी आपातकाल का जबरदस्त विरोध हुआ। इसका परिणाम यह रहा कि पुलिस ने विरोध करने वालों की धरपकड़ शुरू कर दी। आपातकाल का विरोध करने वालों में आरएसएस स्वयंसेवक सबसे आगे रहे। मेरठ से सैकड़ों लोग गिरफ्तारी देकर जेलों में गए। पल्हैडा निवासी जनमेजय चौहान भी उनमें प्रमुख रूप से शामिल थे।

नौ दिसम्बर 1975 को एक जत्थे का नेतृत्व करते हुए तीन लोगों के साथ सदर बाजार थाने में गिरफ्तारी दी। जन्मेजय के छोटे भाई व विहिप के प्रांत प्रचार प्रमुख शीलेंद्र चौहान ने बताया कि जेल में दी गई शारीरिक यातानाओं से भी वह अपने संकल्प से पीछे नहीं हटे। उनका परिवार आपातकाल के समय मेरठ शहर में रहता था। छह महीने बाद डीआईआर में जमानत मिली तो संघ के नेतृत्व में फिर से भूमिगत रहकर आपातकाल का विरोध शुरू कर दी। पुलिस पीछे लगी थी और मेरठ में खूनी पुल पर आरएसएस के तत्कालीन नगर प्रचारक रामलाल और वीरेंद्र के साथ जनमेजय को भी मीसा में गिरफ्तार कर लया गया। इसके बाद आपातकाल खत्म होने के बाद भी जेल से रिहाई हुई।

काम नहीं आया रिहाई का फार्मूला

जेल जाने के बाद जनमेजय ने रिहाई के लिए एक नया फार्मूला अपनाया। लोकसभा चुनावों की घोषणा के बाद मेरठ सीट से परचा भरने की सोची कि शायद चुनाव प्रत्याशी के नाम पर जमानत मिल जाए, लेकिन मीसा कानून में जमानत का कोई प्रावधान नहीं होने के कारण यह फार्मूला काम नहीं आया। 75 वर्षीय जनमेजय इस समय परिवार के साथ मेरठ के इंदिरा नगर में रहते हैं और आंखों से देखने में असमर्थ है।

रेडियो मैकेनिक की दुकान थी सत्याग्रह का केंद्र

जनमेजय चौहान की मेरठ में बेगमपुल के पास रेडियो मैकेनिक की दुकान थी। यह दुकान आपातकाल में सत्याग्रह का केंद्र बन गई थी। जनमेजय को मीसा के अंतर्गत गिरफ्तार करने के बाद पुलिस दुकान पर आई। उससे पहले ही संघ स्वयंसेवक पहुंच गई और दिल्ली से सत्याग्रह की मेरठ प्रांत में वितरण के लिए आई सामग्री को आग लगा दी। जब तक पुलिस पहुंची तो सारे कागज जल चुके थे। इस पर पुलिसकर्मी संघ को बुरा-भला कहते हुए बोले कि संघ हमसे भी दो कदम आगे हैं। इससे पहले मानसरोवर काॅलोनी में हुई लोकतंत्र सेनानियों की बैठक की पुलिस को जानकारी नहीं मिल पाई थी और पुलिस काफी खोजबीन कर रही थी।

लोकतंत्र सेनानी के पिता थे स्वतंत्रता सेनानी

लोकतंत्र सेनानी जनमेजय चौहान का पूरा परिवार आरएसएस से जुड़ा हुआ है। उनके पिता रत्नाकर शास्त्री स्वतंत्रता सेनानी थे। वे 1939 में अंग्रेजों के खिलाफ लड़ते हुए जेल गए थे। एक ही परिवार से स्वतंत्रता सेनानी और लोकतंत्र सेनानी का होना गर्व करने लायक है। जनता पार्टी सरकार में आपातकाल की जांच के लिए शाह आयोग बना था। लखनऊ से उत्पीड़न करने वाले अधिकारियों के बारे में कई बार जानकारी मांगी गई, लेकिन जनमेजय चौहान ने यह कहकर मना कर दिया कि ये लोग तो केवल अपनी ड्यूटी कर रहे थे। दंडात्मक कार्रवाई तो दिल्ली में बैठे लोगों के खिलाफ की जाए।