सुल्तानपुर :- आपातकाल के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े लोगों को ढूंढ-ढूंढ कर यातनाएं दी गई। कांग्रेस का यह बेखौफ चेहरा अंग्रेजी हुकूमत से कम नहीं था। आपातकाल के दिनों की याद आते ही आंखें भर आती हैं। पुलिस का बेखौफ चेहरा देख लोग सहमे -सहमे से नजर आते थे। बाग बगीचों खेत खलिहानों में दिन गुजरता था।
जिले के वरिष्ठ पत्रकार लोकतंत्र सेनानी स्वर्गीय रामकृष्ण जायसवाल “गुरु जी” के नाम से मशहूर थे। सात साल पहले 88 वर्ष की अवस्था में निधन हो गया। गुरू जी के पुत्र अरुण जायसवाल ने हिंदुस्थान समाचार से बात की। आपातकाल के दिनों को याद करते हुए उनकी आंखें भर आई।
उन्होंने बताया कि पिताजी पत्रकार होने के साथ-साथ इंटर कॉलेज में अध्यापक थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सक्रिय कार्यकर्ता थे। बांधमंडी के पास स्थित आर्य समाज मंदिर में एक कार्यक्रम से पुलिस ने पहली बार पिताजी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था।
सम्बन्धों के कारण पुलिस ने गिरफ्तार करने से किया था मना
उन्होंने बताया कि पत्रकार होने के नाते पुलिस प्रशासन से पिताजी के अच्छे संबंध थे। एक पुलिस अधिकारी ने बताया था कि पिताजी को गिरफ्तार करने के लिए उन्हें कहा गया तो उन्होंने साफ मना कर दिया था, कि मैं गिरफ्तार करने नहीं जा पाऊंगा क्योंकि हमारे उनके घरेलू संबंध है।
21 महीने की काटी जेल की सजा 
उन्होंने कहा कि मैं छोटा था पिताजी आज से 45 वर्ष पूर्व आपातकाल में पिता श्री रामकृष्ण जायसवाल 21 महीने जेल में डीआईआर व मीसा के तहत बन्द रहे व यातनाएं सही थी। जेल में बंद रहने पर दाढ़ी बढ़ गयी थी। उनको वेतन भी मिलना बंद हो गया था। खाने के लाले पड़ गए थे। वेश बदलकर चोरी छुपे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े लोग राशन पानी, सौ-पचास की मदद भी करने के लिए घर तक पहुँचते थे। उस समय ₹50 की मदद भी एक बहुत बड़ी मदद होती थी।
उन्होंने कहा कि जेल में मिलाई करने के लिए सबसे पहले जिला अधिकारी के यहां परमिशन लेना पड़ता था, इसके बाद ही मिलाई हो पाती थी।
बाग बगीचों खेत खलिहानों में गुजरा है दिन 
उन्होंने कहा कि पुलिस का डर और खौफ इतना था कि लोग बाग बगीचों, खेत खलिहानों, मंदिरों में छुप कर रहते थे, इसके बावजूद भी पुलिस की नजर पड़ गई तो उन्हें मुसीबत ही झेलनी पड़ती थी। लोगों के नाखून तक निकाल लेते थे। नसबंदी के लिए जबरन पकड़ कर ले जाते थे। नसबंदी का अभियान जोरो पर था। नगर हो या गाँव लोग भगाभगा फिरते थे। किसान दिनभर खेत में ही काम करते थे। बगीचे में छुपे रहते थे उन्हें वहीं से उठा लिया जाता था और नसबंदी करा दी जाती थी।