लखीमपुर-खीरी :- 25 जून 1975 का वह दिन लोकतंत्र के रखवाले शायद कभी भूल नहीं सकते शायद यही कारण है कि आपातकालीन की यात्राओं को झेलने वाले लोकतंत्र सेनानी कि आंखें इस दिन की याद से ही भर आई।
उन्होंने अपने साथ हुई यातनाओं के बारे में बताते हुए कहा कि ब्रिटिश शासन काल से भी ज्यादा भयावन था यह आपातकाल जो पुलिस द्वारा दी जा रही यात्राओं की भयावह कहानी है।
जनपद के ओयल कस्बा निवासी सेनानी लाल सिंह ने बताया कि देश में 25 जून सन् 1975 में आपातकाल लगाकर लोकतंत्र की हत्या कर दी गई थी। उन दिनों लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने भी लोकतंत्र की बहाली के लिए आंदोलन शुरू किया तो देश के अनेक युवा लोकतंत्र रखवाले इस आंदोलन में उनके साथ हो लिए।
इस पर तत्कालीन सरकार ने अपने विरोधियों को गिरफ्तार कर उन्हें मिशा एवं डीआईआर की धारा लगाकर बंद कर दिया था। जिला स्तर पर विरोधी दल के नेताओं एवं कार्यकर्ताओं को व्यापक स्तर पर रातोंरात गिरफ्तार कर उन्हें घोर यातनाएं देकर उन्हें जेल में डाल दिया था।
पुलिसिया जुल्म जो ब्रिटिश हुकूमत को भी शर्मसार कर देते थे
लोकतंत्र सेनानी लाल सिंह ने यह भी बताया कि उस दौरान ढाये गये पुलिसिया जुल्म ब्रिटिश हुकूमत को भी शर्मसार कर देते हैं। इन राजनीतिक बंदियों को किसी खतरनाक मुलाजिमों की तरह और यातनाएं दी जाती थी। लाल सिंह को 30 दिसंबर 1975 को कड़ाके की भीषण ठंड में रात को घर से गिरफ्तार कर उन पर पुलिसिया जुल्म ढाए। वह लोकतंत्र सेनानी लाल सिंह से आरएसएस के जिला प्रचारक का पता ठिकाना मारपीट कर पूछते रहे, किंतु उन्होंने इस बाबत पुलिसिया जुल्म सहकर भी अपनी जुबां नहीं खोली। आखिरकार उन्हें जेल की सलाखों में कैद कर दिया गया।
आपातकाल याद भर से कांप उठता है जहन 
वह बताते हैं पुलिस ने आपातकाल में जुल्म की सारी हदें तोड़ दी थीं। आपातकाल के दौरान प्रेस पर सेंसर लगा दिया गया था और उस पर सरकारी रिसीवर बैठा दिया गया था। इससे सही जानकारी आवाम तक नहीं पहुंच पाती थी। इसलिए हम लोग एक टीम बनाकर रात को लोकतंत्र सेनानियों द्वारा निकाला जाने वाला जनता समाचार नामक अखबार लोगों के घरों में चुपके से घरों के दरवाजों में डाल दिया जाता था। इसमें सरकार की असलियत की विस्तृत जानकारी प्रकाशित होती थी। लाल सिंह बताते है कि आपातकाल की याद आते ही आज भी उनका जहन कांप जाता है।